प्रयागराज का महाकुम्भ 2025 – आस्था का महामेला’ – सुधीर श्रीवास्तव

vivratidarpan.com ‘प्रयागराज का महाकुम्भ 2025 – आस्था का महामेला’ महाकुम्भ के बहुआयामी स्वरूप के काव्यात्मक/ चित्रात्मक अभिव्यक्ति को सैद्धांतिक/वैचारिक और आध्यात्मिकता का अनुपम उदाहरण है। वरिष्ठ कवयित्री डॉ. पूर्णिमा पाण्डेय…

समाजवाद का डुबता सूरज –  डॉ अनमोल कुमार

समाजवाद के झंडे पर अब धूल जमी है, नारे कहीं गलियों में खो गए। “सबका हक, सबकी रोटी” कहने वाले, बाजार की भीड़ में खो गए। कारखाने बंद, खेत उदास,…

घर लौटना – रेखा मित्तल

घर से निकले हुए लोग कभी घर वापस नहीं लौटते सपनों की उड़ान इतनी बड़ी हो जाती है घर लौटने का वक्त ही नहीं मिलता कभी लौटते हैं अपने आशियाने…

जीवन बंजर रेत – डॉ. प्रियंका सौरभ

जब दौलत की लालसा, बाँटे मन के खेत। ठूँठा-ठूँठा जग लगे, जीवन बंजर रेत।।   रिश्तों वाले गाँव में, घूम रहे अब प्रेत, जीते-जी इंसान सब, होते जाते श्वेत। चेहरों…

ग़ज़ल – नीलांजना गुप्ता   

नगर बसते जा रहे हैं दिल उजड़ते जा रहे हैं, दुनियाँ रोशन हो रही उर दीप बुझते जा रहे हैं,   क्या गिले शिकवे करें किसने हमको आकर लूटा, दोस्तों…

बॉलीवुड के स्वयंभू मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान के दोहरे मापदंड – मनोज कुमार अग्रवाल

vivratidarpan.com – आज आपको अभिनेता आमिर खान का टीवी शो सत्यमेव जयते याद दिलाते हैं जिसमें वह हिन्दू मान्यताओं को केंद्र में रखते हुए आलोचना कर अपना ज्ञान बांटते थे…

ग़ज़ल – रीता गुलाटी

चले आओ,स़नम मेरे, मुहब्बत ही दुआ भी है, तुम्हें पूजा सदा मैने मुहब्बत वो ख़ुदा भी है।   हुआ सूना ये मन कौना तुम्हे हरदम पुकारेगे, मिलोगे तुम हमे जब…

आशा की किरण – राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

अँधियारे के आँगन में, एक रेखा उजियारी, चुपके से आ बैठी, बनकर नई सवारी। टूटे हुए सपनों की, धूल अभी बाकी थी, उसमें ही चमक उठी, जैसे कोई ज्योति पावन…

सफर – राजेश कुमार झा

संदर्भ भी छूट जाएगा, शहर भी छूट जाएगा। जहां हम पैदा हुए थे,वो दर और घर भी छूट जाएगा।। छूट जाएगा वो हर रिश्ता , अपनो और बैगानो से। जिस…

बदल गया इंसान (लघुकथा) – डा. सहदेव बालियान

vivratidarpan.com – ज्येष्ठ महीने की चिलकती धूप वाली तेज गर्मी पड़नी शुरू हो गई थी.सुबह शाम क्यारी के पेड़-पौधों की सिंचाई करने से मिट्टी में नमी और ठंडक बनी रहने…