एक स्त्री के चेहरे को
देख कर
सुबह ने
अपनी जल्दबाज़ी छोड़ दी है
आँखें…
किसी शांत झील की तरह
जहाँ आसमान
बिना शोर किए
अपनी परछाईं रख देता है
बाल…
हवा की धीमी चाल से
कंधों पर टिके हुए
जैसे पेड़
अपनी छाया को
सँभाल कर रखते हों
होंठ…
सांझ के रंग में डूबे
न बुलाते हुए
न रोकते हुए
बस
मौजूद
चेहरे की बनावट में
फूलों की नाज़ुकता नहीं
धरती की स्थिरता है
जो हर ऋतु में
अपनी पहचान नहीं बदलती
उसकी मौजूदगी
किसी खुशबू की तरह नहीं
जो फैल जाए
यह तो
मिट्टी की तरह है
जो पास हो
तो सब कुछ
अपना लगने लगे
उसे देखकर
प्रकृति…
कुछ देर के लिए
आईने में
खुद को देखती है।
-रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा
