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ग़ज़ल – विनोद निराश

उनकी अदाओ पर हम मरते गए, छुप-छुप के दीदार हम करते गए। देख कर उनकी बेरुखी को यारो, कभी उफ्फ कभी आहे भरते गए। उनकी तंगदिली की बात क्या? सितम…

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ग़ज़ल – विनोद निराश

उनकी अदाओ पर हम मरते गए, छुप-छुप के दीदार हम करते गए। देख कर उनकी बेरुखी को यारो, कभी उफ्फ कभी आहे भरते गए। उनकी तंगदिली की बात क्या? सितम…