राष्ट्रीय समाचार

ग़ज़ल – डॉ0 अशोक गुलशन

कभी बैठकर कभी लेटकर चलकर रोये बाबू जी, घर की छत पर बैठ अकेले जमकर रोये बाबू जी।   अपनों का व्यवहार बुढ़ापे में ग़ैरों सा लगता है, इसी बात…

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ग़ज़ल – डॉ0 अशोक गुलशन

कभी बैठकर कभी लेटकर चलकर रोये बाबू जी, घर की छत पर बैठ अकेले जमकर रोये बाबू जी।   अपनों का व्यवहार बुढ़ापे में ग़ैरों सा लगता है, इसी बात…