अँधियारे के आँगन में, एक रेखा उजियारी, चुपके से आ बैठी, बनकर नई सवारी। टूटे हुए सपनों की, धूल अभी बाकी थी, उसमें ही चमक उठी, जैसे कोई ज्योति पावन…