पुस्तक – राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

किताबें हैं दीपक ज्ञान के,

अंधियारे में उजियारा भरती,

हर पन्ना जैसे नई कहानी,

जीवन को दिशा ये करती।

शब्दों में सिमटी दुनियाएँ,

सपनों को देती हैं उड़ान,

मौन रहकर भी ये बोलें,

करती मन का विस्तार।

कभी हँसाएँ, कभी रुलाएँ,

कभी सिखाएँ जीने का ढंग,

किताबें सच्ची साथी बनकर,

भर दें जीवन में रंग।

चलो आज फिर प्रण ये लें,

ज्ञान का दीप जलाएँ हम,

हर घर में हो पुस्तक की खुशबू,

पढ़ने का संस्कार जगाएँ हम।

-राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

जगदलपुर राजिम , छत्तीसगढ़

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