खेतवा जोतवले हइ, पनिया भरवले हइ।
खेतवा निखार कके बियवा छिंटवले हइ।
लगवले हई महंग वाली मजदूरिया हो,
पिया छोड़ा ना शहरिया।
देखा आके आपन खेतबरिया हो।
पिया छोड़ा ना शहरिया।
रोपावे खातिर धान पिया बियवा सुखात बा।
कैइसे होई धनरोपनी पिया कुछऊ ना बुझात बा।
बिना धनवा बिना होई ना अब गुजरिया हो,
पिया छोड़ा ना शहरिया
देखा आके आपन खेतबरिया हो।
पिया छोड़ा ना शहरिया।
सासु धान रोपिहे ना ससुर खेतवा जोतिहे ना।
ननदों मोबाइल छोड़िहे ना देवरा कुछऊ करिहें ना।
गोदी में लइकवा बुझा मोर मजबूरिया हो।
पिया छोड़ा ना शहरिया।
देखा आके आपन खेतबरिया हो।
पिया छोड़ा ना शहरिया।
केतनो कमईबा पिया अनजवे तू खैइबा ।
सुखी जाई खेती पिया आके का तू करबा।
आवा संगवे लुटल जाई खेती के लहरिया हो।
पिया छोड़ा ना शहरिया।
देखा आके आपन खेतबरिया हो।
पिया छोड़ा ना शहरिया।
– श्याम कुंवर भारती (राजभर )
बोकारो, झारखंड।, मॉब.9955509286,
