क्या सचमुच
सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला
अमल किया जायेगा
या इसका भी
मज़ाक उड़ाया जायेगा
वहां जहाँ स्त्रियों को सिर्फ़
भोग की वस्तु
समझी जाती है
वहां जहाँ चौखट के बाहर कभी
कदम ही नही रखने दिया जाता
या वहां जहाँ चूल्हे चौके
से ज्यादा
उसकी जरूरत
समझी ही नही गई।
कभी उसकी राय मानी या
मांगी ही नही गई।
और अगर
अपने से उसने दे भी दिया तो
नज़र अंदाज़ कर दिया गया
किसी फ़ैसले पर
उसकी सहमति या असहमति
पूछी ही नही गई
जबकि
घर उसी के व्यवहार से
चलता है
चाहे रसोई हो
या रिश्ता, बच्चे हो, या पति
ये कह सकते हैं
कि वो रीढ़ की हड्डी होती है
उसके बिना
सब चरमरा जाता है
चाहे वो
बच्चों की परवरिश हो
या बुजुर्गों की सेवा
सारी जिम्मेदारियां वही
उठाती है।
पर अपनी मर्जी से
खुश रहने का भी
हक उसे नही है
गर खुश हो जाये
तो लोग चार बातें बनाते हैं।
सबसे बड़ी बात तो ये कि
जिसके साथ ब्याही जाती
वो ही नही समझता
न ही मान सम्मान इज़्ज़त देता
फिर कौन से
अधिकारों की बात
की जा रही
कुछ को छोड़ के
देखा जाये तो
अधिकांश घरों में
स्त्रियों की स्थिति
बहुत दयनीय
और बद से बदतर है।
हर गांव ,गली, मुहल्ले, कस्बें,
शहर, नगर, महानगर के एक-एक घरों में
कोई झांक कर तो देखे
रोंगटे खड़े कर देने वाले खुलासे सामने आयेंगे
काश कि
कोर्ट का यह फैसला
हर घर तक पहुंच पाये
तो हर बच्ची ,लड़की और स्त्री
को न्याय मिले जाये
और उनका जीवन
खुशियों से भर जाये ।
– कंचन श्रीवास्तव, आरज़ू प्रयागराज
