प्यार करते बड़ा, मान जाना पड़ा,
दर्द अपना हमें, सब भुलाना पड़ा।
सात जन्मों का तेरा मेरा साथ है,
प्यार अपना मुझे फिर जताना पड़ा।
इश्क होता फरेबी इसे मान लो,
प्यार मे छोड़ना आशियाना पड़ा।
मुख्तलिफ यार गम को छिपाते रहे,
दर पे आकर ये माथा झुकाना पड़ा।
चाहतों को न तू बुलबुला मानना,
प्यार अपना भी सारा लुटाना पड़ा।
हमको माँ तेरी चौखट पे आना पड़ा,
आज दर पे तिरे सर झुकाना पड़ा।
इश्क तेरा हमे दर्द देने लगा,
आज अश्को को सबसे छुपाना पड़ा।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़
