ग़ज़ल – नित्यानंद बाजपेयी

माँ भले शक्कर थीं थोड़े थे तो खारे बाउजी,
किंतु जीवन के सहारे थे हमारे बाउजी।

भा गए मेले में जितने भी खिलौने थे हमें,
जेब ख़ाली कर के भी लाए वो सारे बाउजी।

बेटियों की मायके में अहमियत ही क्या बची,
हो गए जब से सुपुर्द-ए-ख़ाक प्यारे बाउजी।

क्या कहूँ वो सख़्त थे पर सिर्फ़ बाहर की तरफ़,
बेल के फल जैसे अंदर थे गुदारे बाउजी।

वो गणित जब-जब पढ़ाते थे हमें अम्मा क़सम,
कान पर लाफों पे लाफे धर के हारे बाउजी।

मुझ को दसवीं क्लास में अव्वल सुना तो रो पड़े,
इतने भावुक थे हमारे प्यारे-प्यारे बाउजी।

उन की हर एक सीख ने हम को सँभाला हर क़दम,
नित्य मेरी चेतना के हैं सितारे बाउजी।
– नित्यानंद वाजपेई”उपमन्यु”
गीता विहार कॉलोनी पांचाल घाट, गंगाधाम
फतेहगढ़ फर्रूखाबाद (उत्तर प्रदेश)- 209601

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *