भजन – नीलांजना गुप्ता

रे मनुआ साँसे छलती जाये,

कालगति समझ न तुझको आये।

 

लगा रहे नित जगत कर्म में,

करे न प्रभु की फेरी।

बीती जाये उमरिया यूँ ही,

करते तेरी मेरी।

रे मनुआ कुछ तो करले उपाय,

कालगति समझ न तुझको आये।

 

बचपन खेल-खेल में खोया,

जवानी गई मुस्काय।

जर्जर काया, छूटे न माया,

बुढापा रहो रुलाय।

रे मनवा कुछ तो जतन कराय,

कालगति समझ न तुझको आये।

 

जीवन सन्ध्या कब हो जाये,

बन्ध जावेगी ठठरी।

पापकर्म की भारी भरकम

सिर पर होगी गठरी।

रिश्ते नातेदार,पड़ोसी।

सब हो गए पराये

रे मनुआ कुछ तो जतन कराय,

कालगति समझ न तुझको आये।

– नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश

 

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