नगर बसते जा रहे हैं दिल उजड़ते जा रहे हैं,
दुनियाँ रोशन हो रही उर दीप बुझते जा रहे हैं,
क्या गिले शिकवे करें किसने हमको आकर लूटा,
दोस्तों के हाथों ही खंजर उतरते जा रहे हैं,
भ्रमित हैं महफ़िल में आकर किसे हम अपना कहें,
सुई की रफ्तार से चेहरे बदलते जा रहे हैं,
जिनको रोशन किया उनकी नज़र में तूफान है अब,
इस तरह ख्यालात के मौसम बदलते जा रहें हैं,
यदि किनारे पर डुबोते थाह की कोशिश भी करते,
किन्तु अब मझधार भी साहिल निगलते जा रहे हैं।
– नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश
