आशा की किरण – राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

अँधियारे के आँगन में, एक रेखा उजियारी,

चुपके से आ बैठी, बनकर नई सवारी।

टूटे हुए सपनों की, धूल अभी बाकी थी,

उसमें ही चमक उठी, जैसे कोई ज्योति पावन सी।

थकी हुई आँखों में, फिर रंग भरने लगी,

सूनी सी धड़कनों को, गीत सुनाने लगी।

जब रास्ते थम जाएँ, कदम भी रुक जाएँ,

वो किरण मुस्काकर, मंज़िल का पता बताए।

नन्हीं सी है लेकिन, साहस बड़ा लाती,

गिरते हुए इंसान को, फिर से खड़ा बनाती।

हर रात के सीने में, एक सुबह छुपी होती,

बस उसी का नाम ही, आशा की किरण होती।

मुरझाए से मन में, फिर फूल खिलाने लगी,

बुझती हुई चाहत में, लौ फिर जलाने लगी।

हर हार की गहराई में, जीत की आहट देती,

जीवन के हर मोड़ पे, नई दिशा दिखाती रहती।

– राजलक्ष्मी श्रीवास्तव, जगदलपुर, राजिम, छत्तीसगढ़

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *