आज उसने कहा
“मैं हमेशा साथ रहूँगा।”
उसके “हमेशा” में
वाई-फाई की रेंज जितनी दूरी थी।
मैंने पूछा
अगर बैटरी लो हो गई तो?
वो बोला
“पावर बैंक रखूँगा।”
रिश्तों के लिए भी
अब चार्जर चाहिए।
उसने कसम खाई
कि हर दुख बाँट लेगा।
मैंने सोचा
क्या दुख भी अब
EMI पर आते हैं?
उसने कहा
तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊँगा।
और उसी वक्त
उसकी उँगलियाँ
किसी और की स्टोरी पर
दिल भेज रही थीं।
वादा उसके लिए
एक इमोजी था
पीला, गोल, मुस्कुराता,
जिसे भेजते ही
ज़िम्मेदारी खत्म हो जाती है।
लोग शब्दों की मिठाई बाँटते हैं,
जिसमें शक्कर ज़्यादा
सच कम होता है।
मुझे हमेशा से लगा
वादा करना आसान है,
निभाना वैसा ही
जैसे बिना हेलमेट
ट्रैफिक पुलिस के सामने से निकलना।
सबको भरोसा है
कि पकड़े नहीं जाएँगे।
मैंने उससे कहा
वादा मत करो।
बस अगली बार
जब मैं चुप रहूँ
तो मेरी चुप्पी से मत भागना।
अगर सच में साथ देना है
तो कैलेंडर में नहीं,
आदतों में जगह बनाओ।
क्योंकि रिश्ते
घोषणा से नहीं चलते,
रोज़मर्रा की छोटी
जिम्मेदारियों से चलते हैं।
और प्रेम
कोई ऐप नहीं
जिसे अपडेट करके
फिर अनइंस्टॉल कर दिया जाए।
-रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा
