द्वापर में मथुरावासी सँग, सारा भारत था बेहाल,
नारायण से करें प्रार्थना, प्रभु जी आप सुधारो हाल।
अवतारी फिर से धरती पर, आओ करने को उद्धार,
बंदीगृह में तब ही जन्मे, नटवर नागर नंदगोपाल।
कृष्ण बड़े मनमोहक हैं मुरली मनभावन नित्य बजाते,
प्रेम करें हर भक्तन से शुभ जीवन की वह राह दिखाते।
योग प्रयोग करे जन मानस जीवन पद्धति वो सिखलाते,
कर्म करें फल को न तकें यह गूढ़ रहस्य सदा बतलाते।
कृष्ण बसे जब से मन में तब से दिल को कुछ और न भाता,
गोपन गोपिन भाँति बसी छवि चित्त वहीं नित दौड़ लगाता।
नैन निहार रहे दिन रात अदृश्य हुआ घनश्याम सताता,
दर्शन जो मुरलीधर दें सुख चैन तभी मन को मिल पाता।
मोहन की मुरली मनभावन चित्त अनेक लुभाय रही है,
होंठ लगे उपजे सुर मादक वो मधु को बरसाय रही है।
गोपिन-गोप सखा सँग धेनु खगों तक को भरमाय रही है,
कृष्ण पिया बन के बँसुरी नित सौतन भांति सताय रही है।
– कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, उत्तर प्रदेश
