वो अंगनाई क्यों हुई पराई – नीलांजना गुप्ता

मेरा रिश्ता जोड़ दिया दूजे आँगन से
ओ बाबुल क्यों हुई पराई
अब भी याद आती हैं मुझको वो गलियाँ
वो अंगनाई क्यों हुई पराई

भूल गए क्यों मैं भी तेरा वंश तो थी
बेटा नहीं मैं बेटी थी पर अंश तो थी
यादों की सौगात लिये आँखे भर आईं,
ओ बाबुल क्यों हुईं पराई

क्यों बेटी को दूजा कह कर बिदा किया
जिसको पलकों पर रखते थे भुला दिया
बागों में अब भी महके है वो अमराई,
ओ बाबुल क्यों हुई पराई

हर बेटी को देहरी छोड़ के जाना है
दूजे कुल की मर्यादा भी निभाना है
किसने ऐसी रीत बनाई समझ न पाई
ओ बाबुल मैं हुई पराई।
– नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश        

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *