शुष्क है यह भग्न उर
नीर नयनों में भरा
ताप विरहाग्नि सहे,
कंपित हुई यह धरा।
तिमिरमय इस चेतना में
भोर फिर से क्या उगेगी?
तृप्ति फिर से तब मिलेगी!!
मौन बैठी कल्पना,
आस का दीपक लिए।
शून्य पावन मन्दिरों में
प्रिये जो आँसू दिए।
चिर-विरहित इस हृदय को
तृप्ति फिर से क्या मिलेगी?
भोर फिर से क्या उगेगी??
शांत कर दे जाह्नवी,
आ हृदय में तू सकल।
प्राण के इस मरुस्थल में
खिल उठे फिर से कमल।
सत्य बोलो हे प्रिये!
क्या नेह सरिता सी बहेगी
भोर फिर से वह उगेगी?
तृप्ति फिर से वह मिलेगी?
-सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर
