चले आओ,स़नम मेरे, मुहब्बत ही दुआ भी है,
तुम्हें पूजा सदा मैने मुहब्बत वो ख़ुदा भी है।
हुआ सूना ये मन कौना तुम्हे हरदम पुकारेगे,
मिलोगे तुम हमे जब भी ये सर अपना झुका भी है।
कहाँ ढूँढूँ सकूँ अपना, नही जानी अदा तेरी,
जगे अरमा लबों पर दिख रही लाली, हया भी है।
मुझे जो चाहता है,खूबसूरत है वो दीवाना,
वही अंदाज है कातिल, यहाँ सबसे जुदा भी है।
मिला मौका अग़र हमको तुम्हे चाहत दिखाएंगे,
खुदा की नेमते है प्यार देता अब श़फ़ा भी है।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़
