vivratidarpan.com – तुम्हें कुछ बनाना नहीं आता कहता हुआ जब बेटा रसोई से बाहर गया तो रीना को मां की याद आई।वो भी तो बचपन में यही शब्द मां को बोला करती थी और मां चुप लगा के बात को टाल जाती थी,पर उसके पीछे की सच्चाई कुछ और ही थी वो आज समझ में आया जब मैं खुद मां बनी, उफ मतलब गृहस्थी के भरमजाल में फंसी।
कितना मुश्किल होता है घर बसाने के बाद उसे चलाना हां चलाना क्योंकि उसे चलाने के लिए हर रोज न जाने कितनी जद्दोजहद करनी पड़ती है। हर रोज नई जरूरते,नया बखेड़ा ये कह लो एक नये चैलेंज के साथ हमें गुज़रना पड़ता है और सबसे बड़ी बात तो ये है कि किसी को पता भी ना चले इसका भी ख्याल रखना पड़ता है
वरना पति का आफिस बच्चों की पढ़ाई डिस्टर्ब होगी। इसलिए गृहणी बहुत कुछ छिपा ले जाती है। देखा जाये तो खुद के शौक ही ज्यादा मारती हैं और अपनी ही सेहत को ज्यादा नज़र अंदाज़ करती हैं।
यहाँ तक की कभी कभी देखा जाता है कि चीज़े कम हैं तो खुद चखती तक नही वही परिवार को भर पेट खिला देती हैं।
बच्चों को छींक भर आ जाये तो तुरंत डा. के पास ले जाती वही अपनी बड़ी से बड़ी बिमारी छुपा ले जाती हैं। और यही गुण उन्हें कुशल गृहणी बनाती है।
मजाल है कि दरवाजे पर कोई तकाज़ा वाला कुंडी खटखटा जाये।
महीने की पहली तारीख को ही सबका हिसाब चुकता कर देती हैं।
भले पूरे महीने कम में चला ले पर दरवाजे पर किसी लेनदार को आने नही देती ।
वो सोच ही रही थी कि बेटे ने फिर आवाज़ लगाई ।
अम्मा जो बना है वही लाओ मुझे स्कूल के लिए देर हो रही।
सबकी मम्मियां बढ़िया बढ़िया बना कर ,रोज बदल बदल कर टिफिन देती हैं।
वही तुम हो कि हफ्ते में चार दिन अचार पराठा तो दो दिन भुनी आलू और पराठा देती है।
उसकी ये आवाज़ उसके कानों में शीशे की तरह घुल रही थी पर चुप थी।
वो कैसे बताती की बेटा मुझे ही रोज रोज एक ही खाना देना अच्छा नही लगता पर जेब खाली हो तो यही बहुत लगता है।
बनाना सब कुछ मुझे भी आता है पर सामान नही होता इसलिए ना बनाने का बहाना करती हूँ।
कभी मैं भी ऐसे ही बोला करती थी पर आज जब खुद गृहस्थी चलानी पड़ रही, तब समझ में आ रहा कि तुम्हारी तरह मैं भी गलत थी नानी को आता सब कुछ था बस सामान न होने के कारण वो नही बनाती थी।
और हम समझते थे, उन्हें बनाना नही आता।
सोचते हुए अचार वाला टिफिन ली और बैग लेकर खड़े बेटे की तरह मुस्कुराते हुए बढ़ा दिया।
– कंचन श्रीवास्तव आरज़ू, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
