vivratidarpan.com – सुधा सब कुछ छोड़ कर आश्रम में आ गई है। उसे अपने जीवन में कुछ भी करने को नहीं रह गया था। घर में बहुत खुश थी। पर जैसे कुछ भी नहीं था। लोगों की निगाह में वो सब था। बंगला गाड़ी नौकर-चाकर। क्या नहीं था।बस नहीं था। तो एक कोई उसे अपना समझ ने वाला। वो समझ चुकी थी। इसका कुछ भी पर्याय नहीं है। फ़िर भी उसे एक बार तो जरूर अहसास होता था कि कोई उससे बात करे हाल चाल पूछे। पास बैठे। दुनिया भर की बाते करे। यहां सभी बेटा बहु बच्चे अपने अपने कामों में व्यस्त रहते थे। जो भी घर में रहता वो या तो फोन पर या ऑन लाइन आई फोन पर बिजी रहता। सुधा को समय पर चाय नाश्ता खाना टी वी पर सभी प्रोग्राम भी देख लिया करती थी। धीरे धीरे सभी लोग उसे नजर अंदाज कर ने लगे। एक दिन उसे पुरानी स्कूल की सहेली सुमन का फोन आया। बड़ी खुश हो गई। खुप देर तक सारी पुरानी यादों में खो गई थी। वो सहेली ने अंत में बताया कि वह आश्रम में रहती है। उसने अपना जीवन एक गृहिणी की जिम्मेदारी में बिताया था। थोड़े दिन बाद उसके पति का देहांत होगया तब सभी लोग उसे घर में उसे नजर अंदाज करने लगे। रिश्तेदारों का भी आना जाना बंद हो गया। आखिर में उसने घर जो पति ने उसके नाम कर दिया था। उसे बेच दिया। और आश्रम में आ गई थी। पूरे घर के बेटे बहु बच्चे सकते में आ गए थे। उन्होंने खूब प्रयास किया कि सुमन उनके बीच रहे मगर सुमन को अपने लोग आश्रम में मिल गए थे। जो उनके साथ घूमना फिरना और अच्छे कार्यक्रम में बिजी रहने लगी थी। अब सुधा ने भी घर बेच दिया। और वह भी आश्रम में आ गई थी। उसके अपने वही लोग जो घर में उसे देखते भी नहीं थे। वे लोग सुमन को समझाने में कोई कसर ना छोड़ी। पर उनकी बातों का सुमन पर कोई असर न हुआ। और वो सुधा के साथ अपना खुश हाल जीवन बिताने लगी। और वहां उसने बड़े बुजुर्ग की सेवा की जिम्मेदारी भी ले ली थी। अब वह बहुत खुश थी।
-जया भराड़े बड़ोदकर, टाटा सीरिन, ठाणे, वेस्ट मुंबई (महाराष्ट्र)
