राह चलते देखा, ढाबे के किनारे। यंत्र से बना पुतला। बार-बार नमस्ते की, सजग मुद्रा में। सोचा, कितना सटीक है, इंसान का पुतला। इंसानी समाज में। इंसान जो बन बैठा,…
Category: मनोरंजन
जीतिया पर माँ की भावना – डॉ अनमोल कुमार
नहा खा कर व्रत धरा, निर्जला है आज, जीतिया का नेम है, पुत्र की है लाज। न अन्न का दाना लगे, न पानी की बूँद, बस मेरे लाल की लगे,…
