हरियाली हो गोद धरा की, पर्यावरण बचाओ।
नवल पौध को देखो, सींचो, खुशहाली तुम लाओ।।
लता, विटप, तरु, फूल, शजर अरु तरुवर खूब उगाओ।
हरियाली हो गोद धरा की, पर्यावरण बचाओ।।
बदलें हम सब रूप धरा का, पौधे सभी लगाएँ।
सही राह जग को दिखलाएँ, आभा नवल जगाएँ।।
मिट्टी की सौंधी खुशबू को, उर में सदा बसाओ।
हरियाली हो गोद धरा की, पर्यावरण बचाओ।।
कटते वृक्ष चीख रहे हैं, करो नहीं मनमानी।
मौसम बदले, पड़ता सूखा, क्या मानव ने ठानी।।
बंजर होती रोती धरती, बगिया खूब सजाओ।
हरियाली हो गोद धरा की, पर्यावरण बचाओ।।
धरती के हर जड़-चेतन में, प्राणवायु को सींचो।
हलधर के श्रम को नित जानो, डोर प्रेम की खींचो।।
खूब किया है दोहन हमने, अब मानव फ़र्ज़ निभाओ।
हरियाली हो गोद धरा की, पर्यावरण बचाओ।।
कविता बिष्ट ‘नेह’, देहरादून , उत्तराखंड
