वंदन तुझे, हे श्रमवीर (गीत) – डॉ ओम प्रकाश मिश्र

वंदन तुझे, हे श्रमवीर!

वंदन तुझे, हे श्रमवीर!!

अंबर छूते शिखर सभी ये, तेरी ही पहचान,

तेरे श्रम की रेखाओं से, रचता नव निर्माण।

भट्टियों की ज्वाला बोले, तेरी ही हुंकार,

लोहे के हर कण में बसता, तेरा ही विस्तार।

धूप धुले तन, पवन थपेड़े, फिर भी अडिग अधीर,

कंधों पर संसार उठाए, चलता चुप गंभीर।

वंदन तुझे, हे श्रमवीर!

वंदन तुझे, हे श्रमवीर!!

तेरे हाथों से ही सजे हैं, जीवन के उत्सव,

तेरे दम से ही हँसते हैं, सपनों के हर नव।

तू ही यज्ञ की पावन ज्वाला, तू ही पावन धाम,

तेरे तप से ही धड़क रहा, सृष्टि का हर ग्राम।

कर्म तेरे उपनिषदों से, गूँजे सत्य गंभीर,

त्याग तेरा गीत अमर है, तू जीवन का नीर।

वंदन तुझे, हे श्रमवीर!

वंदन तुझे, हे श्रमवीर!!

क्यों फिर तेरी आँखों में है, पीड़ा का विस्तार?

क्यों तेरे ही हिस्से आया, जीवन का अंधकार?

सबका कल तू आज बनाता, खुद से ही अनजान,

तेरी धड़कन पर ही चलता, यह सारा जहान।

तू ही समिधा, तू ही हवन है, तू सृष्टि अधीर,

तेरे बिन सब शून्य यहाँ है, हे अजर अमर धीर।

वंदन तुझे, हे श्रमवीर!

वंदन तुझे, हे श्रमवीर!!

~ डॉ ओम प्रकाश मिश्र मधुब्रत

(अज्ञातमेघार्जुनजमदग्निपुरी)

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