लहरें – सविता सिंह

शांत चित्त, सौम्य मुख,
आँखों की भाषा,
और दिल की गहराई
मापना कठिनतम है!
फिर भी, चुपके से
जब देखता है उसे वो चाँद,
मन हो उठता अधीर,
जैसे बरसों से
मिलन की प्रतीक्षा हो।
हो भी क्यों न
पूनम का चाँद देखते ही
समुद्र की लहरें भी
हो उठती हैं व्याकुल,
छोड़ देती हैं अपना किनारा,
उफन-उफनकर
बढ़ती हैं उसकी ओर
जैसे चाँद को छू लेने की
हठ लिए हों।
शायद प्रेम भी ऐसा ही है
शांत दिखाई देता है बाहर से,
पर भीतर
लहरों-सा उठता रहता है,
और प्रिय के एक दीदार भर से
सारा अस्तित्व
मिलन को तड़प उठता है।
– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

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