मैं शाम की लड़की हूँ – रुचि मित्तल

मैं शाम की लड़की हूँ

रोशनी मुझ पर ठहर सी जाती है।

जैसे फ़व्वारे की हर बूँद

मेरे नाम की कोई

ख़ामोश दुआ लेकर गिरती हो

बिना शोर किए, बस

भीगाती हुई दिल का आँगन।

मैं मुस्कुराती हूँ तो

दिन अपने काँधे से थकान उतार देता है

हवा मेरी ज़ुल्फ़ों में

घूमकर पता पूछती है

किस ख़याल का पता है तुम्हारा?

कपड़ों की यह हल्की-सी जाली

दरअसल मेरे सपनों की कढ़ाई है

धागा-धागा बोलता है

कि मैं किसी मौसम में नहीं बंधती

मौसम मुझमें उतरते हैं।

मैं कोई तस्वीर नहीं…

मैं वक़्त की पलकों पर

रखा एक लम्हा हूँ

छू लो…

तो शायद

तुम्हारी उँगलियों पर

मेरी मुस्कुराहट का रंग लग जाए।

©रुचि मित्तल, झज्जर , हरियाणा

 

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