फल वाली (लघु प्रेम कथा) – राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

गांव की छोटी-सी बाजार में रोज़ एक लड़की टोकरी में फल लेकर बैठती थी। सब उसे “फल वाली” कहकर बुलाते थे, लेकिन उसका नाम राधा था। उसकी मुस्कान में ऐसी मिठास थी कि जैसे आम का रस, और बातों में ऐसी नरमी जैसे पके केले की खुशबू।

उसी बाजार में एक लड़का आता था—अमन। वह हर रोज़ कोई न कोई बहाना बनाकर राधा के पास से फल खरीदता। कभी सेब, कभी संतरा, तो कभी सिर्फ दो केले… जबकि घर में फल पहले से होते थे।

एक दिन राधा मुस्कुराकर बोली,

“इतने फल ले जाते हो, खाते भी हो या बस बहाना है?”

अमन थोड़ा झेंप गया, फिर धीरे से बोला,

“सच कहूं… फल तो बहाना है, मैं तो तुमसे मिलने आता हूं।”

राधा की आंखों में हल्की-सी चमक आ गई। उसने एक लाल सेब उठाकर अमन की ओर बढ़ाया और बोली,

“तो आज ये सेब मुफ्त… क्योंकि आज तुमने सच्चाई का फल लिया है।”

धीरे-धीरे दोनों की बातें बढ़ने लगीं। बाजार की भीड़ में उनका छोटा-सा संसार बस गया। एक दिन अमन ने हिम्मत जुटाकर कहा,

“राधा, क्या तुम मेरे साथ जिंदगी बिताओगी?”

राधा ने मुस्कुराकर अपनी टोकरी उसकी ओर बढ़ा दी और बोली,

“ये फल तो मैं बेचती हूं, पर दिल… वो तो कब का तुम्हें दे चुकी हूं।”

उस दिन से बाजार में “फल वाली” सिर्फ फल नहीं बेचती थी, बल्कि अपनी मुस्कान और प्यार से हर दिन को मीठा बना देती थी… और अमन को मिल गया था उसका सबसे प्यारा फल—सच्चा प्यार।

– राजलक्ष्मी श्रीवास्तव, जगदलपुर राजिम, छत्तीसगढ़

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