प्रकृति का कहर — क्षमा कौशिक

हाहाकार मचा हुआ है, बादल कैसा बरस रहा है।

रूप काल का धारण करके, क्रोधित होकर बरस रहा है।।

 

प्रलयंकारी बादल को देखो, बरसते ही जा रहे हैं।

राह में जो भी पड़ा सब, लीलते ही जा रहे हैं।।

 

दरक रहे हैं पर्वत टीले, रेतों से ज्यों बने हुए हों।

घर होटल मंदिर दुकानें, मिट्टी के ज्यों बने हुए हों।।

 

भरभरा कर दरक रहे हैं, घर तिनके से तैर रहे हैं।

कागज की नावों से वाहन, जल में बहते दीख रहें हैं।।

 

रौद्र रूप धर कर नदियों ने, रोष हृदय का दिखा दिया है।

क्रंदन कातर मचा हुआ है, बादल कैसा बरस रहा है।।

 

चीख पुकारें मची हुई हैं,बेबस होकर देख रहे हैं।

आपाधापी पड़ी हुई है,आफत से सब जूझ रहे हैं।।

 

इसे कहें मानव की गलती, या प्रलय का समय हुआ है।

रुष्ट प्रकृति ने सजा सुनाई, या बदले का समय हुआ है।।

-क्षमा कौशिक, देहरादून, उत्तराखंड

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