पिता का साया – प्रीति पारीक

तेरा साया मेरे सिर पर था
तब तक बेखौफ शेर सा था मैं,,,,

ना सुबह की चिंता ,ना शाम की फिक्र ,
असीम आनंद में भीगा था मैं ,

घर की चाल का पता नहीं था,
सुनहरे रंगों का कर्ज पता नहीं था,

वह चांद, वह मुस्कान,
उभरी हुई आशा का मोल- भाव
सब कोने में थे,
वह दिन बड़े अलबेले थे,

शिक्षा की चाल पर चलाया गया,
दर्जनों किस्सों में सुनाया गया,

खुद की ताकत का अंदाजा भी नहीं था,
पिता क्या होता है?
अंदाजा भी नहीं था,,,,

खुद की औकात समझ जब आई,
तो साया साथ नहीं था ,
उसका एहसास नहीं था,
था बस मैं खड़ा की दूर कहीं ,,
इसी उम्मीद में कि,,,,,
है देख रहा तू खड़ा,,,

तेरे आदर्शों पर चलूंगा मैं,
एक दिन सफल बनूगा मैं
याद अब आती है बहुत
जब एक-एक शब्द पर खरा उतारूंगा,,,

तेरे जैसी ताकत भुजा में नहीं है मेरे ,
पर तेरे जैसा बनने का साहस ,,
बस है मन में
तू था तो सब कुछ था,,
है गुजारिश उस रब से यही ,,,
हर जन्म में मेरा साया बने वहीं,,,,
– प्रीति पारीक,जयपुर, राजस्थान

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