अब तो आये रोज़ ही, टूट रहे परिवार,
फूट-कलह ने खींच दी, आँगन में दीवार॥
कल तक थी जिस आँगना, गूँजी हँसी-फुहार,
अब सन्नाटों का वहाँ, फैला है अंधियार।
रिश्तों की नीलामियाँ, लगती बारंबार—
अब तो आये रोज़ ही, टूट रहे परिवार॥
थाली में जो साथ थे, बाँट रहे थे प्यार,
वही गिनें अब लाभ को, तौलें हर व्यवहार।
रिश्तों में भी खून के, दिखता अब व्यापार—
अब तो आये रोज़ ही, टूट रहे परिवार॥
माँ की आँखें भीगतीं, बाप हुआ लाचार,
बँटते-बँटते बँट गया, हर रिश्ता, हर प्यार।
छत एक ही रह गई, बिखरे सब अधिकार—
अब तो आये रोज़ ही, टूट रहे परिवार॥
समझौतों की सुलह ही, बन बैठी आधार,
दिल से दिल के बीच में, खिंची नई दीवार।
संस्कारों की छाँव भी, होती अब लाचार—
अब तो आये रोज़ ही, टूट रहे परिवार॥
भाई-भाई दूर हैं, बहना भी बेगान,
स्वार्थों की इस दौड़ में, खोया हर अरमान।
नेह-नदी सूख गई, जला मनो-अंगार—
अब तो आये रोज़ ही, टूट रहे परिवार॥
जागो अब इंसान तुम, छोड़ो झूठा भार,
नेह-सूत्र में जोड़ लो, टूटे सब परिवार।
वरना केवल नाम का, रह जाएगा संसार—
अब तो आये रोज़ ही, टूट रहे परिवार॥
– डॉ. प्रियंका सौरभ, उब्बा भवन, आर्यनगर,
हिसार (हरियाणा) – 125005, मोबाइल: 7015375570
