जीवन बंजर रेत – डॉ. प्रियंका सौरभ

जब दौलत की लालसा, बाँटे मन के खेत।

ठूँठा-ठूँठा जग लगे, जीवन बंजर रेत।।

 

रिश्तों वाले गाँव में, घूम रहे अब प्रेत,

जीते-जी इंसान सब, होते जाते श्वेत।

चेहरों की मुस्कान भी, लगती आज अचेत—

ठूँठा-ठूँठा जग लगे, जीवन बंजर रेत।।

 

दौलत के आगे सभी, टूटे रिश्ते प्रीत ।

भीतर केवल स्वार्थ है, बाहर मीठे गीत।

सत्ता की चौखट हुई, झूठों वाली भेंट—

ठूँठा-ठूँठा जग लगे, जीवन बंजर रेत।।

 

अपनों से ही आजकल, मिलता गहरा घात,

मतलब पूरे हो गए, फिर ना पूछें बात।

समुंदर जैसे दिल हुए, मुट्ठी भर की रेत—

ठूँठा-ठूँठा जग लगे, जीवन बंजर रेत।।

 

सौरभ कहे बचाइए, मन को थोड़ा चेत,

वरना रिश्तों का नगर, बन जाएगा प्रेत।

धन से ऊँचा प्रेम है, समझो जीवन हेत—

ठूँठा-ठूँठा जग लगे, जीवन बंजर रेत।।

✍️ — डॉ. प्रियंका सौरभ, उब्बा भवन,

आर्यनगर,हिसार (हरियाणा) – 125005

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