पुष्प खिले हैं हर कहीं, पवन बहे अति मंद।
भँवरे आतुर हैं सभी, पीने को मकरंद।।
छटा बिखेरें तितलियाँ, रंग-बिरंगे फूल।
खग छेड़ें स्वर लहरियाँ, पा मौसम अनुकूल।।
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आदमी को संतुलित व्यवहार करना चाहिये।
नित्य वाणी से मनुज के फूल झरना चाहिये।
जो बढ़ाये दूरियाँ नित आपसी संबंध में,
मानवों के मन बसा वह दम्भ मरना चाहिये।1
– कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, उत्तर प्रदेश
