आग फैली है फिज़ाओं में हवा कैसे बहे ।
देवता घायल पड़े शैतानियत के कहकहे ।
आदमीयत रो रही आतंक के इस दौर में ,
राजनेता कर रहे इस बात पर भी चहचहे ।
गैर देते बद्दुआ तो तल्ख़ मैं होता नहीं ,
घाव अपनों के दिए जो आज तक मैंने सहे ।
चूर हैं सारे इरादे औ ज़िगर नाशाद है ,
जिंदगी का कारवां घायल बशर कैसे गहे ।
सिर्फ़ शब्दों के पुलंदे दिख रहे साहित्य में ,
छंद के आवास पर छलछंद के टीले ढहे ।
मज़हबी आगोश में कुछ लोग पत्थर हो गए ,
कौन है ऐसा मसीहा जो इन्हें आकर तहे ।
मुद्दतों की तिशनगी तो मयकदे में कैद है ,
दिल ज़िगर सूखे हुए तो कौन से घर में रहे ।
यार ने धोखा दिया तो जग गई दीवानगी ,
रोज पीना छोड़ ‘हलधर’ डांटकर साकी कहे ।
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून
