कृष्णा कन्हैया – डॉ क्षमा कौशिक

कर नयन चंचल मधुर वंशी बजाता है।
छेड़ कर रस रागिनी मन को चुराता है।।

सिर-मुकुट पट-पीत कटि किंकिण गले माला।
साँवरे ये रूप तेरा मन लुभाता है।।

तट कभी यमुना निकुंजों में कभी छिप कर।
धर अधर मुरली बजा सबको बुलाता है।।

गोप ग्वाले संग ले कर गेह में घुसकर।
छीक पर रखा दधि,माखन खिलाता है।।

क्यों गए मथुरा कहो ब्रज वीथियाँ तजकर
छल तुम्हारा गोपियों को नित सताता है।।
– डॉ क्षमा कौशिक, देहरादून , उत्तराखंड

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