अंजन मसि से लिखूँ मैं पाती – सविता सिंह

सघन तम में मन विकल,

नयन मरु में उमड़े बादल

निज उर की ही थाह न पाती,

अंजन मसि से लिखूँ मैं पाती।

तुम मुझ में और मैं हूँ तुममें,

कृष्ण राधामय राधा कृष्ण मय,

हम तो ठहरे एक दूजे के थाती,

तेरी ओर खिंची चली जाती

अंजन मसि से लिखूँ मैं पाती|

सोहे ना तनिक कर्णफूल,

श्रृंगार लागे है जैसे शूल,

मोम से बंधी हुई एक बाती,

ऊष्मा से जिसके पिघल जाती,

अंजन मसि से लिखूं मैं पाती।

हर आहट से चौंक पडूँ,

कभी भागूँ कभी लौट पडूँ,

कुंतल काली मुझे भरमाती,

एक टीस अंतस भर जाती

अंजन मसि से लिखूँ मैं पाती।

-सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

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