मेरा मन उड़ता परिंदा, नभ से बातें करता,
बिन पंखों के ही जाने, कितनी दूर उतरता।
कभी बादलों की बाहों में, सपनों को सजाता,
कभी धूप की सीढ़ी चढ़कर, उजियारा अपनाता।
ना कोई बंधन रोके, ना कोई जाल थामे,
हर दिशा में इसकी चाहत, खुद अपना रास्ता थामे।
कभी बारिश की बूंदों संग, गीत नया रचता,
कभी सूनी शामों में भी, दीपक सा जगता।
हवा के संग बहता जाता, छू ले हर किनारा,
कभी सागर की गहराई, कभी पर्वत का सहारा।
थक जाए जब दुनिया सारी, ये फिर भी ना थमता,
अंधेरों की गोद में भी, उजियारा ही चुनता।
ना हार का डर इसे, ना जीत का अहंकार,
बस उड़ना इसकी फितरत, यही इसका संसार।
मेरा मन उड़ता परिंदा, आज़ादी का दीवाना,
हर बंदिश को तोड़कर, खुद में ही खो
– राजलक्ष्मी श्रीवास्तव, जगदलपुर राजिम, छत्तीसगढ़
