बदलते मौसम से बदल मत जाना
यह जो हवा का रुख है
यह तुम्हारी दिशा तय करने नहीं आया।
धूप का तेज होना
तुम्हारी सहनशक्ति की परीक्षा है।
छाँव का मिल जाना
तुम्हारी सच्चाई का इनाम नहीं।
जो आज साथ चल रहा है
वह कल भी तुम्हारा ही था
बस हालात ने आवाज़ बदल दी है।
पत्तों का गिरना
पेड़ के खत्म होने की घोषणा नहीं
जड़ें अब भी ज़मीन से बात कर रही हैं।
तालियाँ थक जाती हैं
सन्नाटा स्थायी नहीं होता
इन दोनों के बीच
अगर कुछ स्थिर रहना चाहिए
तो वह तुम्हारा होना है।
मत बदलना
इसलिए नहीं कि दुनिया क्या कहेगी
इसलिए कि
जब तुम खुद से मिलो
तो पहचान बाकी रहे।
-रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा
