साहित्य के लिए संगत हूं,
देश के लिए अर्पित हूं।
माता-पिता के लिए गर्व हूं,
संस्कारों का सच्चा पर्व हूं।
कविता के लिए चौकीदार हूं,
सत्य पथ का पहरेदार हूं।
प्रेम के लिए दिल हूं,
मानवता की मंज़िल हूं।
कलम मेरी साधना है,
भारत मेरी आराधना है।
भाषाओं का दीप जलाकर,
संस्कृति का रखवाला हूं।
न धन का अभिमान मुझे,
न यश का कोई मोह है।
जन-जन तक हिंदी पहुँचे,
बस इतना ही संकल्प है।
हर कवि का सम्मान बने,
हर रचना पहचान बने।
भारत की पावन मिट्टी का,
मैं छोटा सा गुणगान बने।
– डॉ. गुंडाल विजय कुमार, हैदराबाद
