जन्नत – जया भराड़े बड़ोदकर

Vivratidarpan.com – राजू आज बड़ा हो गया है। कल जब वह छोटा था। तो मां को परेशान कर के रख देता था। खाना खाने में बहुत परेशान कर देता था। मां हर दम खाना लेकर पीछे पीछे घूमती रहती। कभी चिड़िया दिखाती तो कभी कुछ दिखाती पर राजू कुछ नहीं खाता। मां सब काम छोड़ कर बस एक ही काम करती की किसी तरह राजू खाना खाले। ऐसे ही स्कूल भी जाने को कभी तैयार नहीं होता। पर वह स्कूल जाकर छुप कर देखता मां भी राजू को रोता देखती तो खुद भी रोने लगती। मां सच में महान थी जो उसके लिए क्या-क्या नहीं कर ती थी। बाकी लोग भी थे। घर में पर,,,,,। आज वो बड़ा हो गया है। ना तो खाना नसीब हो रहा है ना सुकून। काश उसने मां की कदर की होती तो भगवान उसे ये सजा नहीं देता। क्यों कि वो पढ़ाई से जी चुराकर घर से भाग गया था। अब वो शहर के एक स्कूल में चपरासी का काम कर रहा है। उसे हर बच्चे में राजू स्वयं को देखता और उनके लिए दुआ करता। की सभी बच्चे पढ़ लिख कर कुछ न कुछ बन कर देश की सेवा कर सके। एक दिन रोहन शिवम और शुभम ये स्कूल के बच्चे आपस मे बहुत लड़ने लगे। और मारा मारी पर उतर आए। राजू सब देख रहा था। तुरंत उसने उन बच्चों को अलग किया और प्यार से समझाया । बच्चों ने देखा कि राजू समझाते समय उसकी आंखों में आंसू आ गए थे। वो समझ गए कि राजू केवल चपरासी नहीं था। वो उन बच्चों में अपना बचपन देख रहा था। राजू स्वयं को दोषी मान बैठा था। और आज मां को हर पल याद कर के इस दुनिया में सभी की जिम्मेदारी निभा रहा था। और इस तरह राजू अपना स्वार्थ भूल कर सभी की सेवा में लग गया था।

– जया भराड़े बड़ोदकर, टाटा सीरिन, ठाणे, वेस्ट मुंबई, महाराष्ट्र

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