गैया हिन्दू हो गई, औ’ बकरा इस्लाम,
पशुओं के भी हो गए, जाति-धर्म से नाम॥
इंसानों की सोच ने, बाँटे सबके काम,
मूक जीव भी ढो रहे, नफ़रत के इल्ज़ाम।
प्रेम-दया की राह पर, चलता नहीं अवाम—
गैया हिन्दू हो गई, औ’ बकरा इस्लाम॥
मंदिर-मस्जिद बाँटते, धरती सबका धाम,
फिर भी मानव ढूँढ़ता, नफ़रत के इल्ज़ाम।
रक्त बहाकर पूछता, क्या मिलता परिणाम—
गैया हिन्दू हो गई, औ’ बकरा इस्लाम॥
धर्म नहीं कहता कभी, करने को अपमान,
हर प्राणी में बस रहा, एक ही चेतन-प्राण।
फिर क्यों बाँटे जा रहे, जीवों के भी नाम—
गैया हिन्दू हो गई, औ’ बकरा इस्लाम॥
जागो अब इंसान तुम, समझो सच्चा ज्ञान,
प्रेम-दया से ही बने, सुंदर हिन्दुस्तान।
मानवता से बढ़ नहीं, कोई और विधान—
गैया हिन्दू हो गई, औ’ बकरा इस्लाम॥
✍ — डॉ. प्रियंका सौरभ, 333, परी वाटिका,
कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा
