खुला है दर रफाकत का,रहेगी दोस्ती कब तक?,
निभाएगे सदा मिलकर रहे ये दोस्ती कब तक।
सुनो ऐ चाँद सा चेहरा दिखा देते हमे जाना,
तुम्हारी राह देखेगी हमारी आशिकी कब तक।
न जाने आज दिल की वो खता कह दी जमाने से,
रहेगी आँख मे यारा कहो ये अब नमी कब तक।
करी मेहनत सदा दिल से,नही सोचा कभी अपना,
मिले मेहनत का कुछ अच्छा मिलेगी तीरगी कब तक
गुजारीं है उम्र मैने, लगे वो कैदखाने सी,
मिलेगी आशिकी सुन लो हमे अब आपकी कब तक।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़
