कलयुग की कहानी – डॉ अनमोल कुमार

यह कलयुग है भाई, यहाँ रिश्ते भी बिकते हैं,

मतलब के यारों से, अब घर-आँगन टिकते हैं।

बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपया,

धर्म की बात करे जो, उसे लोग कहते ठगुआ।

 

माँ-बाप वृद्धाश्रम में, बच्चे फोन पर व्यस्त,

संस्कार की किताबें, अलमारी में दबी पस्त।

गुरु को ज्ञान नहीं, चेला देता उपदेश,

सच्चा बोले तो पागल, झूठा करे अनमोल ।

 

भाई-भाई का दुश्मन, जमीन के दो टुकड़े पर,

बहन की राखी सूखी, पड़ी किसी नुक्कड़ पर।

नेता कुर्सी के भूखे, जनता भूख से बेहाल,

मंदिर-मस्जिद के नाम पर, रोज बहे यहाँ खून लाल।

 

मोबाइल में डूबे सब, आँख से आँख नहीं मिलती,

लाइक्स-कमेंट के पीछे, जिंदगी रोज बिकती।

प्यार हुआ इंस्टा वाला, दो दिन में ब्रेकअप,

रिश्ते हुए किराये के, सुबह रखे शाम को पैकअप।

 

फिर भी आस नहीं छोड़ी, उम्मीद का दीप जलता है,

कहीं किसी कोने में, इंसान आज भी पलता है।

जब अपने पे आ जाये, तो कलयुग भी डरता है,

एक नेक दिल इंसान, सौ शैतानों पर भारी पड़ता है।

 

तो तू मत घबरा बंदे, कलयुग से लड़ जाना,

सच की मशाल लेकर, अंधेरे को चीर जाना।

क्योंकि रात जितनी काली, सुबह उतनी पास है,

तेरे कर्मों में दम है, तो कलयुग भी तेरा दास है।

-डॉ अनमोल कुमार, मोकामा, जिला – पटना (बिहार)

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