हर आँगन दीवार- डॉo सत्यवान सौरभ

घर-घर में मनभेद है, बचा नहीं अब प्यार।

फूट-कलह ने खींच दी, हर आँगन दीवार॥

 

स्नेह और आशीष में, बैठ गई है रार,65

अरमानों के बाग में, भरा जलन का खार।

अपने ही अपनों को दें, अब कटुता उपहार—

फूट-कलह ने खींच दी, हर आँगन दीवार॥

 

रिश्तों की गर्माहटें, खो बैठीं व्यवहार,

चेहरों पर मुस्कान है, भीतर गहरा भार।

मन के सूने गाँव में, रोता हर परिवार—

फूट-कलह ने खींच दी, हर आँगन दीवार॥

 

माँ की आँखें पूछतीं, कहाँ गया वह नेह,

जिससे महके घर सदा, जिससे जुड़ता स्नेह।

दौलत की आँधी बनी, तोड़ रही आधार—

फूट-कलह ने खींच दी, हर आँगन दीवार॥

 

भाई-भाई दूर हैं, टूट गए विश्वास,

छोटी-छोटी बात पर, बिखर रहे अहसास।

प्रेम बिना सूना लगे, जीवन का संसार—

फूट-कलह ने खींच दी, हर आँगन दीवार॥

 

जागो अब इंसान तुम, जोड़ो टूटे तार,

प्रेम-दया से ही बचे, रिश्तों का संसार।

मिटे सदा ही प्रेम से, नफरत का अंधकार—

फूट-कलह ने खींच दी, हर आँगन दीवार॥

– डॉo सत्यवान सौरभ 333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी,

हरियाणा – 127045, मोबाइल :9466526148,01255281381

 

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