सुरक्षकर्मियों की विडंबना – प्रवीण त्रिपाठी

शस्त्र बल, सब को सुहाते किसलिये।
मान के सब गान गाते किसलिये।1
ढेर सारे, क्षेत्र जब व्यवसाय के।
मौत से पंजा लड़ाते किसलिये।2
हर विपद में, सैनिकों को याद कर।
बाद में उनको भुलाते किसलिये।3
शौर्य गाथाएँ लिखें निज रक्त से।
जिंदगी धूमिल कराते किस लिये।4
कर्म में उनके न कोई खोट है।
दाग शुचिता पर लगाते किसलिये।5
राष्ट्र रक्षा सैन्यबल की सोच में।
सिरफिरे गाली सुनाते किसलिये।6
हर सिपाही, चाहता सम्मान जब।
योग्यता पर, शक़ जताते किसलिये।7
ज्वार उमड़े, जोश का बलिदान पर।
वीरगति को भूल जाते किसलिये।8
याद रहती, है शहीदी चार दिन।
परिजनों तक, को भुलाते किसलिये।9
राष्ट्र सेवा बाद लौटें जब कभी।
ठोकरें उनको खिलाते किसलिये।10
हर सिपाही धर्म से निरपेक्ष है।
स्वार्थवश मुहरा बनाते किसलिये।11
– प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, उत्तर प्रदेश

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