vivratidarpan.com – भारत के चुनावी इतिहास में दो तस्वीरें हमारे लोकतंत्र की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। पहली तस्वीर उस दौर की है, जब देश के पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन के सामने एक ऐसे भारत में चुनाव कराने की चुनौती थी, जो विभाजन की त्रासदी, विस्थापन, गरीबी और व्यापक निरक्षरता से जूझ रहा था।
दूसरी तस्वीर आज की है, जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) के दौरान नागरिकता और पात्रता से जुड़े दस्तावेजों की जांच, नामों के छूटने तथा मताधिकार की सुरक्षा को लेकर बहस चल रही है। इन दोनों तस्वीरों के बीच सात दशक से अधिक का अंतर है।
भारत जब स्वतंत्र हुआ, तब उसके सामने केवल संविधान निर्माण और शासन व्यवस्था स्थापित करने की चुनौती नहीं थी। विभाजन के कारण लाखों लोग विस्थापित हो चुके थे। अनेक रियासतों का भारत में विलय हो रहा था। गरीबी व्यापक थी और शिक्षा का प्रसार सीमित। ऐसे समय में संविधान निर्माताओं ने वयस्क मताधिकार को भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद बनाने का निर्णय लिया।
यह निर्णय अपने आप में ऐतिहासिक था। स्वतंत्र भारत में मताधिकार को संपत्ति, शिक्षा, सामाजिक हैसियत या लिंग के आधार पर सीमित करने के बजाय संविधान के अनुच्छेद 326 ने वयस्क मताधिकार का सिद्धांत स्वीकार किया। लोकतंत्र की इस अवधारणा का आशय स्पष्ट था कि देश का भविष्य तय करने में नागरिक की भागीदारी उसकी आर्थिक स्थिति या शैक्षणिक योग्यता की मोहताज नहीं होगी।
पहले आम चुनाव की तैयारियों की जिम्मेदारी देश के प्रथम मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन को सौंपी गई। निर्वाचन आयोग के ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, 1951-52 के पहले आम चुनाव के लिए लगभग 17.2 करोड़ मतदाताओं का निर्वाचन क्षेत्र तैयार करना था। उस समय साक्षरता दर बेहद कम थी और देश के विशाल भूभाग में चुनाव कराना एक अभूतपूर्व प्रशासनिक चुनौती थी। उस समय मतदाता सूची तैयार करना आज जैसी तकनीकी सुविधा वाला काम नहीं था। न डिजिटल डेटाबेस थे, न नागरिकों के पास आज की तरह पहचान संबंधी दस्तावेजों की व्यापक उपलब्धता। ऐसे में मतदाता सूची तैयार करने के लिए व्यापक प्रशासनिक प्रयास, स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटाने और नागरिकों तक पहुंचने की आवश्यकता थी।
सुकुमार सेन और उनकी टीम ने इस विशाल कार्य को अंजाम दिया। पहले आम चुनाव ने यह साबित किया कि गरीबी, निरक्षरता और सामाजिक विषमता के बावजूद भारत के नागरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने में सक्षम हैं। इस ऐतिहासिक अनुभव का सबसे महत्वपूर्ण सबक यह था कि लोकतंत्र की सफलता के लिए जनता पर भरोसा करना जरूरी है। नागरिकों की कठिनाइयों को समझे बिना केवल प्रशासनिक नियमों के सहारे लोकतांत्रिक भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
मतदाता सूची में नाम दर्ज होना चुनाव में भागीदारी की पहली शर्त है। यदि किसी पात्र नागरिक का नाम सूची में नहीं है, तो उसका मताधिकार व्यवहार में निष्प्रभावी हो सकता है। इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी यह सुनिश्चित करना भी है कि पुनरीक्षण के दौरान किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से न छूट जाए।
निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी दोहरी है। उसे मृत व्यक्तियों, दोहरी प्रविष्टियों और अपात्र नामों की पहचान करनी है, लेकिन साथ ही प्रत्येक पात्र नागरिक के मताधिकार की रक्षा भी करनी है। इन दोनों उद्देश्यों के बीच संतुलन ही किसी निष्पक्ष पुनरीक्षण की कसौटी होना चाहिए।
यहां एक बुनियादी अंतर समझना आवश्यक है। मतदाता सूची को दुरुस्त करना और पात्र मतदाता को सूची से बाहर कर देना एक ही बात नहीं है। इसी तरह, किसी नाम का मसौदा सूची में न होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संबंधित व्यक्ति का नाम अंतिम सूची से भी हटा दिया गया है। लेकिन यदि किसी पात्र नागरिक का नाम छूट गया है, तो उसके लिए सुधार और अपील की प्रक्रिया सुलभ, पारदर्शी तथा समयबद्ध होनी चाहिए।
जून 2025 में निर्वाचन आयोग ने बिहार से शुरू होने वाली विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के लिए निर्देश जारी किए। इस प्रक्रिया में मतदाताओं के विवरण का नए सिरे से सत्यापन किया गया। जिन मतदाताओं के गणना प्रपत्र निर्धारित समय में वापस नहीं पहुंचे, उनके नाम मसौदा सूची में शामिल नहीं किए जाने की स्थिति पैदा हुई।
बिहार के मामले में 24 जून, 2025 की मतदाता सूची में लगभग 7.89 करोड़ मतदाता दर्ज थे। निर्वाचन आयोग द्वारा प्रस्तुत विवरण के अनुसार, 1 अगस्त, 2025 को प्रकाशित मसौदा सूची में करीब 7.24 करोड़ मतदाता शामिल थे। इस प्रकार लगभग 65 लाख नाम मसौदा सूची में नहीं थे।
सर्वोच्च न्यायालय ने 14 अगस्त, 2025 को निर्देश दिया कि बाहर रह गए मतदाताओं की सूची और नाम शामिल न किए जाने के कारण सार्वजनिक किए जाएं। बाद में न्यायालय ने दावों के साथ आधार कार्ड प्रस्तुत करने की अनुमति देने का निर्देश भी दिया।
यहां बहस का विषय केवल नामों की संख्या नहीं है। असली सवाल यह है कि सूची से बाहर रह गए प्रत्येक पात्र नागरिक को अपनी बात रखने का वास्तविक अवसर मिला या नहीं? क्या उसे समय पर सूचना मिली? क्या उसके लिए जरूरी दस्तावेज जुटाना आसान था? क्या दावा और आपत्ति दर्ज करने की प्रक्रिया ग्रामीण, गरीब, बुजुर्ग, प्रवासी और वंचित नागरिकों के लिए सुलभ थी?
इन सवालों को उठाना निर्वाचन आयोग की मंशा पर बिना प्रमाण आरोप लगाना नहीं है। ये सवाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गुणवत्ता और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े हैं।
निर्वाचन आयोग का पक्ष भी समझना चाहिए। आयोग का दायित्व मतदाता सूची को अद्यतन रखना और अपात्र प्रविष्टियों को हटाना है। लेकिन प्रशासनिक शुद्धता का उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब पात्र नागरिकों के नाम सुरक्षित रहें और किसी त्रुटि को सुधारने के लिए प्रभावी व्यवस्था उपलब्ध हो। मतदाता सूची की शुद्धता और मताधिकार की सुरक्षा परस्पर विरोधी लक्ष्य नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था के दो अनिवार्य आधार हैं।
आधुनिक प्रशासन में पहचान और पात्रता का सत्यापन आवश्यक हो सकता है। लेकिन दस्तावेजों की मांग करते समय यह भी देखना होगा कि संबंधित व्यक्ति के पास उन्हें उपलब्ध कराने की क्षमता और वास्तविक अवसर है या नहीं। भारत में आज भी ऐसे नागरिक हैं जिनके नाम, पते और पारिवारिक विवरण पुराने रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते। विस्थापन, पलायन, विवाह के बाद स्थान परिवर्तन, नामों की वर्तनी में अंतर और अभिलेखों की अनुपलब्धता जैसी समस्याएं वास्तविक हैं।
ऐसी परिस्थितियों में प्रशासन को केवल कागजों के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय सत्यापन के वैकल्पिक उपायों, उचित सूचना और सुनवाई की व्यवस्था पर भी ध्यान देना चाहिए। पात्र नागरिक को अपनी बात रखने का अवसर दिए बिना किसी प्रतिकूल निर्णय तक पहुंचना गंभीर प्रश्न पैदा कर सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि दस्तावेजों की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। अर्थ केवल इतना है कि सत्यापन की प्रक्रिया ऐसी हो, जो गलत प्रविष्टियों को हटाने के साथ-साथ वास्तविक मतदाताओं को अनावश्यक कठिनाई में न डाले।
भारतीय लोकतंत्र की शक्ति केवल नियमित चुनाव कराने में नहीं, बल्कि चुनावों में जनता के विश्वास को बनाए रखने में है। निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है। उसकी स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
जब मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर व्यापक प्रश्न उठते हैं, तब आयोग को स्पष्ट आंकड़ों, सार्वजनिक कारणों और प्रभावी शिकायत निवारण के माध्यम से उनका उत्तर देना चाहिए। राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे प्रमाणों के आधार पर अपनी आपत्तियां दर्ज करें और पात्र मतदाताओं की सहायता करें। न्यायपालिका की भूमिका यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण है कि कानून के अनुपालन के साथ नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा भी हो।
सुकुमार सेन के नेतृत्व में हुए पहले आम चुनाव और आज के एसआईआर के बीच तुलना करते समय ऐतिहासिक परिस्थितियों के अंतर को भी ध्यान में रखना होगा। सात दशक पहले की प्रशासनिक व्यवस्था और आज की कानूनी तथा तकनीकी प्रणाली एक जैसी नहीं हैं। इसलिए उस समय अपनाई गई हर प्रक्रिया को वर्तमान पर हूबहू लागू करना संभव नहीं है। लेकिन उस दौर से मिले लोकतांत्रिक सबक आज भी प्रासंगिक हैं। व्यापक जनभागीदारी, प्रशासनिक निष्पक्षता और नागरिकों के मताधिकार के प्रति संवेदनशीलता।
पहले आम चुनाव ने दुनिया को दिखाया कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार सफल हो सकता है। यह उपलब्धि केवल चुनाव कराने वाले अधिकारियों की नहीं, बल्कि उन करोड़ों नागरिकों की भी थी, जिन्होंने पहली बार लोकतंत्र की प्रक्रिया में हिस्सा लिया।
आज चुनौती अलग है, लेकिन जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी है। निर्वाचन आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि मतदाता सूची की शुद्धता के प्रयास में किसी पात्र नागरिक का अधिकार अनजाने में भी बाधित न हो। सरकारों और राजनीतिक दलों को भी अपने-अपने दावों को प्रमाणों के आधार पर प्रस्तुत करना चाहिए।
सुकुमार सेन के दौर की ऐतिहासिक विरासत को याद करने का उद्देश्य अतीत का महिमामंडन या वर्तमान की हर प्रक्रिया को खारिज करना नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मूल भावना को समझना है। मतदाता सूची केवल नामों का सरकारी रजिस्टर नहीं है,वह नागरिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था के बीच विश्वास का दस्तावेज है। इसलिए आज निर्वाचन आयोग के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कितने कागजात जुटाए गए या कितने नाम हटाए गए। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या प्रत्येक पात्र भारतीय को अपना मताधिकार सुरक्षित रखने और उसका इस्तेमाल करने का वास्तविक अवसर मिला?लोकतंत्र की मजबूती का आकलन इसी कसौटी पर होना चाहिए। (विनायक फीचर्स)
