vivrtidarpan.com (Sandeep Kumar Mishra) – भारतीय संस्कृति में कार्तिक मास का विशेष धार्मिक, ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व है. वर्षा ऋतु की विदाई, शरद ऋतु का सौंदर्य, खेतों में धान की फसल और प्रकृति के बदलते स्वरूप के बीच यह महीना अनेक लोकपर्वों की सौगात लेकर आता है.
1. दीपावली : प्रकाश और समृद्धि का पर्व – कार्तिक अमावस्या को मनाई जाने वाली दीपावली भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन, माता लक्ष्मी की पूजा और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है. मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा हमारी प्राचीन मिट्टी कला, कुम्हारों के श्रम और सामाजिक समृद्धि से जुड़ी है.
2. छठ महापर्व : सूर्य और प्रकृति की उपासना – कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाने वाला छठ बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और मिथिलांचल की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है. नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और प्रातः अर्घ्य इसके चार प्रमुख चरण हैं.
डूबते और उगते दोनों सूर्य को अर्घ्य देना जीवन के संघर्ष और पुनः उदय होने का संदेश देता है. यह पर्व सूर्य, जल, वायु, धरती और कृषि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अनुपम उदाहरण है.
3. छठ का चढ़ावा : कृषि और लोकशिल्प का सम्मान – छठ में ठेकुआ, नारियल, केला, गन्ना, मूली, अदरक और मौसमी फलों का विशेष महत्व है. बांस का सूप और दउरा ग्रामीण शिल्पकला के प्रतीक हैं. ठेकुआ अन्न संस्कृति, नारियल पवित्रता और गन्ना कृषि समृद्धि का प्रतीक माना जाता है.
इस पर्व में किसान, कुम्हार, डोम, बांसकारी कारीगर और फल विक्रेता सहित अनेक ग्रामीण समुदायों की भागीदारी दिखाई देती है.
4. सामा-चकेवा : मिथिला में भाई-बहन के प्रेम की लोकगाथा – छठ के बाद मिथिलांचल में सामा-चकेवा का लोकपर्व प्रारंभ होता है, जो कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है.
लोकमान्यता के अनुसार सामा भगवान श्रीकृष्ण की पुत्री थीं. उन पर झूठा आरोप लगने के कारण उन्हें पक्षी बन जाने का शाप मिला. उनके भाई चकेवा ने बहन को इस संकट से मुक्त कराने के लिए संघर्ष किया. अंततः भाई के प्रेम और समर्पण से बहन को मुक्ति मिली.
यह लोककथा भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और त्याग का संदेश देती है.
इस अवसर पर महिलाएं मिट्टी से सामा, चकेवा, चुगला और विभिन्न पक्षियों की आकृतियां बनाकर उन्हें सजाती हैं. सामूहिक लोकगीत गाए जाते हैं. कार्तिक पूर्णिमा को इस पर्व की विदाई होती है. यह हमारी मिथिला की लोककला, लोकगीत और पारिवारिक संस्कारों की अनमोल धरोहर है.
5. कार्तिक पूर्णिमा : स्नान, दान और लोकमेलों की परंपरा – कार्तिक पूर्णिमा को पवित्र नदियों में स्नान, दीपदान और दान-पुण्य का विशेष महत्व है. बिहार का प्रसिद्ध सोनपुर मेला भी इसी अवसर पर आयोजित होता है. गंगा और गंडक के संगम पर लगने वाला यह मेला पशु व्यापार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लोकसंस्कृति की ऐतिहासिक पहचान है.
निष्कर्ष – कार्तिक मास केवल त्योहारों का महीना नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की जीवंत सांस्कृतिक विरासत है.
दीपावली प्रकाश और समृद्धि का संदेश देती है, छठ प्रकृति और सूर्य के प्रति कृतज्ञता सिखाता है, जबकि सामा-चकेवा भाई-बहन के रिश्ते की मधुरता और त्याग को प्रतिष्ठित करता है. – इन पर्वों में मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हार, बांस की टोकरी बनाने वाले कारीगर, अन्न उपजाने वाले किसान और लोकगीतों को जीवित रखने वाली ग्रामीण महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान है.
हमारी लोकपरंपराओं की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इनमें आस्था के साथ प्रकृति, पूजा के साथ परिश्रम और उत्सव के साथ पारिवारिक प्रेम का सम्मान समाहित है.
अपनी सांस्कृतिक विरासत को जानना, समझना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना ही हमारी सच्ची सामाजिक जिम्मेदारी है.
– श्याम किशोर ✍️
