समाजवाद का डुबता सूरज –  डॉ अनमोल कुमार

समाजवाद के झंडे पर अब धूल जमी है,
नारे कहीं गलियों में खो गए।
“सबका हक, सबकी रोटी” कहने वाले,
बाजार की भीड़ में खो गए।

कारखाने बंद, खेत उदास,
नेता अब कुर्सी के वास्ते है खास।
“युवा तुर्क” की वो गर्जना कहाँ,
अब तो सौदों की है हर एक आस।

समाजवाद का सूरज ढल रहा,
पर उम्मीद की एक किरण बची है।
शायद किसी झोपड़ी के चूल्हे से,
फिर कोई नई सुबह जगेगी
जहाँ समरसता से समाजवाद
का मार्ग दिखेगा।

– डॉ अनमोल कुमार, मोकामा जिला पटना बिहार

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