संदर्भ भी छूट जाएगा, शहर भी छूट जाएगा।
जहां हम पैदा हुए थे,वो दर और घर भी छूट जाएगा।।
छूट जाएगा वो हर रिश्ता , अपनो और बैगानो से।
जिस आंगन में हम खेले थे, गिरे थे और संभले थे।।
जिन हाथों की अंगुली पकड़कर चलना सीखा,।
वो हाथ और साथ भी छूट जाएगा।।
जो थे हमारे दोस्त मित्र सखा, और दुश्मन उनसे भी साथ छूट जाएगा।
ये जीवन का सफर भी अजीब है।। ,
पता नहीं क्यों इंसान खुद पर क्यों इतना मगरुर है।
न जाने किस अभिमान और किस घमंड में मस्त है।।
की मारने के तेरा सब कुछ छूट जाएगा और तू एक याद बनकर रह जाएगा ।।
सफर भी छूट जाएगा और शहर भी छूट जाएगा।
– राजेश कुमार झा, बीना, मध्य प्रदेश, 9328396076
