vivratidarpan.com – भारतीय संस्कृति में जीवन का कोई भी पक्ष लोकआस्था और परंपरा से अछूता नहीं है। पथवारी पूजन ऐसी ही एक आत्मीय लोकपरंपरा है जो हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती है।
राजस्थान में नवरात्र के दिनों में पथवारी पूजन विशेष रूप से होता है। प्रातः स्नान के बाद कन्याएँ व्रत रखकर श्रद्धापूर्वक पथवारी माता की पूजा करती हैं। यह केवल पूजा नहीं, बल्कि बचपन की स्मृतियों, पारिवारिक संस्कारों और लोकगीतों से जुड़ा विश्वास है।
बचपन में हम भी इसका नियमित पालन करते थे। तब न संस्कृति के व्यापक अर्थ का ज्ञान था, न यह समझ कि हमारे छोटे-छोटे क्रियाकलाप हमारी विरासत का हिस्सा हैं। हम तो बस बड़ों को देखकर उनका अनुसरण करते थे। बालमन में प्रश्न उठता कि हम पथवारी की पूजा क्यों करते हैं, तो माँ सहजता से कहतीं-पथवारी हमारे पथ की रक्षा करती हैं।
माँ का यह छोटा-सा उत्तर पर्याप्त होता था। फिर रास्ते में डर नहीं लगता था। खेत पर जाना हो, कुएँ पर पानी लेने जाना हो, मन में निर्भयता बनी रहती थी। आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है कि लोकपरंपराएँ केवल पूजा-विधियाँ नहीं, मन में विश्वास और मानसिक संबल जगाने का माध्यम हैं। यही हमारी लोकसंस्कृति की विशेषता है कि वह बिना कठिन उपदेशों के जीवन के संस्कार अगली पीढ़ी तक पहुँचा देती है।
लोकआस्था और मंगलकामना का प्रतीक – पथवारी पूजन बचपन तक सीमित नहीं है। आज भी जब परिवार का कोई सदस्य यात्रा पर निकलता है, तो परिजन प्रातः पथवारी पूजते हैं और मंगलगीत गाते हैं कि पथवारी माता यात्री के मार्ग की बाधाओं से रक्षा करें और यात्रा निर्विघ्न हो। इस परंपरा में देवी के प्रति श्रद्धा के साथ अपनों के प्रति चिंता और स्नेह भी निहित है।
लोक में पथवारी को मार्ग की रक्षक देवी माना जाता है। जीवन भी एक यात्रा है, जहाँ सरल रास्ते भी हैं और कठिन मोड़ भी। ऐसे में अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा हमें धैर्य और आगे बढ़ने का संबल देती है।
पथ का अर्थ जीवन की दिशा – पथवारी शब्द का संबंध पथ यानी रास्ते से है। भारतीय संस्कृति में रास्ता केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन-यात्रा का प्रतीक है। हम प्रार्थना करते हैं कि हमारा मार्ग सुरक्षित रहे और हम लक्ष्य से न भटकें। नवरात्र में कन्याओं द्वारा पथवारी पूजन देवी-शक्ति के प्रति श्रद्धा के साथ अपनी लोकपरंपराओं से जुड़ने का अवसर भी है।
तालाब से गमले तक – मुझे आज भी वे दिन याद हैं जब हम प्रातः तालाब पर स्नान करने जाते और वहीं पथवारी पूजन करते थे। तालाब केवल स्नान की जगह नहीं, हमारे दैनिक जीवन और सामुदायिक गतिविधियों का हिस्सा था।
समय के साथ गाँवों से शहरों की ओर विस्तार हुआ। शहरों में न वैसे तालाब हैं, न खेतों की पगडंडियाँ। ऐसे में क्या हम परंपरा छोड़ दें? मेरा मानना है कि परंपरा का मूल भाव जीवित रहना चाहिए, स्वरूप बदल सकता है।
यदि आज तालाब नहीं है तो अपने घर के आँगन या छत पर रखे गमले को ही धरती का प्रतीक मान लें। उसे तालाब की पाल समझकर श्रद्धापूर्वक पूजन करें। स्थान छोटा हो सकता है, पर श्रद्धा वही रह सकती है। एक साधारण गमला भी संस्कृति से जुड़ने का माध्यम बन सकता है और बच्चों को अपनी जड़ों से परिचित करा सकता है।
संस्कारों के हस्तांतरण का माध्यम – संस्कृति केवल पुस्तकों से जीवित नहीं रहती। वह तब जीवित रहती है जब लोग उसे अपनाते हैं। हमने माताओं,दादियों,नानियों को पूजा करते देखा, मंगलगीत सुने और श्रद्धा के संस्कार ग्रहण किए। आज हमारी बारी है कि अगली पीढ़ी को इन परंपराओं से परिचित कराएँ। उन्हें केवल विधि नहीं, उससे जुड़ी स्मृतियाँ और भावनाएँ भी बतानी चाहिए।
पथवारी पूजन हमें अपनी जड़ों की ओर देखने का अवसर देता है। आइए, इस नवरात्र में चाहे तालाब की पाल पर हो या घर के छोटे-से गमले के पास, उसी श्रद्धा से पूजन करें और संकल्प लें कि अपनी लोकपरंपराओं को स्मृतियों तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि जीवन में स्थान देंगे। (विभूति फीचर्स)
