विश्व साइकिल दिवस (3 जून)- डॉ अनमोल कुमार

दो पहियों पर चलती जिंदगी,
न पेट्रोल की चिंता, न प्रदूषण की गंदगी।
बचपन की यादें, जवानी की सवारी,
साइकिल है सच में सबकी प्यारी।

पापा की उंगली पकड़ के सीखी,
घुटने छिले पर हिम्मत न हारी।
पहली बार जब बिना सहारे चली,
लगता था जैसे दुनिया जीत ली सारी।

स्कूल का बस्ता, पीछे कैरियर,
दोस्तों की टोली, रेस की तैयारी।
घंटी की टुन-टुन में छुपा संगीत,
हर गली-मोहल्ले की ये ही कहानी।

शहर का शोर, जाम की बीमारी,
AC कार में भी दम घुटे भारी।
साइकिल निकाली, पैडल मारा,
हवा से बातें, मंजिल सबसे न्यारी।

न डॉक्टर की फीस, न जिम की मारा-मारी,
साइकिल चलाओ, सेहत रहे तुम्हारी।
दिल भी दुरुस्त, फेफड़े भी तगड़े,
मोटापा भागे, जिंदगी लगे प्यारी।

धरती माँ कहे, सुनो मेरे बच्चों,
मेरी साँसों में जहर क्यों घोलो?
साइकिल चलाओ, पेड़ लगाओ,
मुझे फिर से हरा-भरा कर दो।

आह्वान –
आओ इस साइकिल दिवस पर कसम खाएँ,
हफ्ते में एक दिन साइकिल अपनाएँ।
तेल बचाएँ, प्रदूषण घटाएँ,
सेहत और धरती दोनों को मुस्कुराएँ।

“जिस देश की सड़कें साइकिल से गुलजार हैं,
उस देश का भविष्य वाकई सेहतमंद और शानदार है।”
-डॉ अनमोल कुमार, मोकामा, पटना, बिहार

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