ये बारिश का मौसम – कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

 पावस ऋतु जब भी आती है, बादल करते शोर रे।

गर्जन तर्जन रिमझिम रिमझिम, हो वर्षा घनघोर रे।

 

धरती ओढ़े धानी चूनर, चहुँदिशि हरियाली छायी।

शुष्क पड़ी महिती पर फिर से, नवल चेतना सी आई।

देख हरीतिम सुंदर वसुधा, मन में उठे हिलोर रे।

पावस ऋतु जब भी आती है, बादल करते शोर रे।

गर्जन तर्जन रिमझिम रिमझिम, हो वर्षा घनघोर रे।

 

तप्त धरा शीतल हो जाती, कूप-सरोवर भर जाते।

विविध रूप जल स्रोतों के तब, उर आनंदित करवाते।

कल-कल ध्वनि सुनकर नदियों की, मन हो भाव विभोर रे।

पावस ऋतु जब भी आती है, बादल करते शोर रे।

गर्जन तर्जन रिमझिम रिमझिम, हो वर्षा घनघोर रे।

-कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, उत्तर प्रदेश

 

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