Vivratidarpan.com – जब मैं गौचर से देहरादून शिफ्ट हुई तो शुरूआत में मैंने सोच लिया था कि दो चार साल किसी तरह निकाल लूंगी और फिर गौचर चली जाऊंगी,
क्योंकि गौचर का माहौल एकदम अलग है यहां से वहां हम रात के 9:00 बजे तक पड़ोसियों के घर बैठे रहते हैं और आधा आधा खा पीकर आने के बाद बस अपने घर में खाना बनाने की औपचारिकता पूरी करते हैं,
एक दूसरे से सारा दुख सुख शेयर करना साथ साथ हर जगह आना जाना,
दून का हिसाब एकदम अलग कोई बात करने को तैयार नहीं,
जैसे पुराने जमाने में बेटियां ससुराल जाकर पहला दिन उसे पहाड़ की तरह लगता था उपरी मुल्क उपरी लोगों के बीच वो अनबनी असहज सी ,उसी दिन से मायके जाने वाले दिन की गिनती करने लगती थी कुछ कुछ उसी तरह ।
अब मैं खुद को एडजस्ट करने की जुगत में लगी हुई थी कि एक दिन दूरदर्शन से मुझे कॉल आया एक कार्यक्रम के लिए जिसमें हमें गढ़वाली परिधान में रहना था,
मैं अपनी सौसायटी के ही एक ब्यूटी पार्लर में गयी जहां पर कॉस्मेटिक सामान भी रखा था , मैंने कहा मुझे गढ़वाली आर्टीफिशियल नथ ,टीका आदि चाहिए,और मुझे कहीं बाहर जाने का अभी अंदाजा भी नहीं है,
तो मेरी बात का जो सामने से रिप्लाई आया उसने मुझे सन्न कर दिया, आपको भी करेगा!!
वो ये था कि आर्टीफिशियल तो मेरे पास नहीं है लेकिन मेरी जो सोने की ज्वैलरी है आप उसे ले जाओ
प्रोग्राम होगा, पहनना, बाद में दे देना,
महज़ एक आद दिन पुरानी जान-पहचान में इतना भरोसा रखने वाली “ये रेखा है”
ज्वैलरी तो मैं नहीं ले आयी लेकिन अपने दिल में बहुत सारी उम्मीद और आश्चर्य लेकर आयी कि इस युग में भी ऐसे लोग होते हैं,
अभी दो चार दिन पहले की ही बात है किसी बात पर मैं उससे नाराज़ हो गई होता है ना जिससे हमें लगाव होता है तो हम थोड़ा सा ज़ालिम भी हो जाते हैं शायद हक़ अधिकार जताने के चक्कर में।
या ये भी हो सकता है कि मान नहीं रही हूं लेकिन उम्र हो ही गई हो जिसका रिफ्लेक्शन ये है कि हम अनायास ही चिड़चिड़े हो जाएं और फिर दूसरे पहर खुश भी हो जाएं,
लेकिन वो बात करने की कोशिश करती रहती है, मनाती रहती है,
मेरे बर्थडे पर गिफ्ट लेकर आ गई,
कभी कभी किसी की विनम्रता हमें बहुत छोटा कर देती है,
जिस तरह मैंने महसूसा खुद को
मेरे जन्मदिन के एक दिन बाद रेखा का बर्थडे आता है,
हमारा अब एक फ्रेंड सर्कल बन गया है देहरादून अब अच्छा लगने लग गया,
दरअसल दोस्ती अपनी ही रैंज वालों से होती है जिनसे आपकी वाइब मिले हम खामखां परेशान होते रहते हैं।
आपके जीवन में ऐसे कितने लोग होते हैं जो आपके बचकानेपन पर हंसते हैं,आप पर क्या अच्छा लगता है यह सजेस्ट करते हैं,आपकी कामियाबी पर खुश होते हैं, आपके ख़फ़ा होने पर आपको मनाते हैं,
शायद कुछ एक-आद यदि आपके जीवन में कोई ऐसी रेखा है तो उसे सहेज कर रखिएगा।
किसी ने कहा है
इस बार देख ऐसा भी मुमकिन है मेरे दोस्त ,
मैं अपना भूल जाऊं पता तेरे शहर में।
– ज्योत्सना जोशी , देहरादून
