( 1 )” मु “, मुख पर
लगाए घूम रहे मुखौटे,
पहचानें कैसे, यहाँ आदमी सच्चे !!
( 2 )” खौ “, खौफ़ खाए
लगें डरावने ये मुखौटे,
इनसे कैसे, यहाँ बचकर निकलें !!
( 3 )” टे “, टेढ़ी-मेढ़ी
चाल चलते ये मुखौटे,
अक़्सर पकड़कर, उलझा ही लेते !!
( 4 )” मुखौटे “, मुखौटे भेष
चलें ये बदल-बदलके,
आसान नहीं समझना, यहाँ इन्हें !!
( 5 )” मुखौटे “, मुखौटे खोटे
पहने घूम रहे उचक्के,
जाएं तो जाएं, कहाँ बचकर इनसे !!
( 6 ) चलते-फिरते
मुखौटे हैं सब, आदमी में आदमी…,
अब भला कोई, यहाँ ढूंढे कैसे !!
सुनील गुप्ता (सुनीलानंद), जयपुर, राजस्थान
